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जब से गइले कान्हा मथुरा नगरिया Jab Se Gaele Kanha Mathura Nagariya

It is said in this song that Radha tells her friend that ever since Kanhaiya i.e. Krishna has gone to Mathura, O friend, I do not feel like...



It is said in this song that Radha tells her friend that ever since Kanhaiya i.e. Krishna has gone to Mathura, O friend, I do not feel like it. The house and courtyard seem small and deserted. There is darkness all around. Why do I do my makeup? Why should I do sixteen makeup? This insignificant body should catch fire and sixteen makeups should burn in it. Every day this pain of separation is burning me and my body. When will Nandkumar Kanhaiya come?



फिल्म :  मोरी सजनी रे

गायक :  अजीत कुमार अकेला

गीतकार:  

संगीतकार: रवि डाटे



जब से गइले कान्हा मथुरा नगरिया 

मोरी सजनी रे मोरी सजनी रे 

लागे नाहीं जियरा हमार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार

जब से गइले कान्हा मथुरा नगरिया मोरी सजनी रे

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार


छिन अंगना छिन गलियन में डोले आहो राम

छिन अंगना छिन गलियन में डोले

मोरी सजनी रे

मोरी सजनी रे चारों ओरी लागे ला अन्हार

मोरी सजनी रे चारों ओरी लागे ला अन्हार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार


काहे लागी सजनी तूहू रखबई देहिया आहो राम

काहे लागी सजनी तू रखबई देहिया 

मोरी सजनी रे

मोरी सजनी रे काहे लागी सोरहो सिंगार 

मोरी सजनी रे काहे लागी सोरहो सिंगार 

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार


अगिया लगाइब इहो पोसल देहिया आहो राम

अगिया लगाइब इहो पोसल देहिया 

मोरी सजनी रे

मोरी सजनी रे आगि लागो सोरहो सिंगार

मोरी सजनी रे आगि लागो सोरहो सिंगार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार


निस दिन बिरह जराबे बिंद देहिया आहो राम

निस दिन बिरह जराबे बिंद देहिया 

मोरी सजनी रे 

मोरी सजनी रे कब अइहें नंद कुमार

मोरी सजनी रे कब अइहें नंद कुमार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार


जब से गइले कान्हा मथुरा नगरिया आहो राम

जब से गइले कान्हा मथुरा नगरिया 

मोरी सजनी रे मोरी सजनी रे 

लागे नाहीं जियरा हमार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार

मोरी सजनी रे लागे नाहीं जियरा हमार



इस गीत में कहा गया है कि राधा अपनी सखी से कहती हैं कि हे सखी जब से कन्हैया यानि कृष्ण मथुरा गए हैं तब से मेरा मन नहीं लगता है। घर और आंगन छोटा व सुनसान लगता है। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा दिखता है। किसलिए मैं अपना श्रृंगार करूं। क्यों मैं सोलहों श्रृंगार करुं। इस तुच्छ शरीर में आग लग जाए और सोलह श्रृंगार उसमें जल जाए। प्रतिदिन यह बिरह की वेदना मुझे और मेरे शरीर को जला रही है। कब नंदकुमार कन्हैया आएंगे। 

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